By डॉ नीरोतिम्म

आज जब देश-दुनिया में पर्यावरण संरक्षण को लेकर अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियां, विमर्श, रैलियां इत्यादि आयोजित कर रही हैं, तब
हम यह विचार करना भूल जाते हैं कि पर्यावरण संरक्षण में एक सामान्य गृहिणी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है या
निभा सकती है? इस सामान्य गृहिणी से पर्यावरण संरक्षण के प्रयोग सीखने की आवश्यकता है। वह अपने दिनभर के
छोटे-बड़े कामो के दौरान पर्यावरण संरक्षण का काम करती रहती है। यह बात कई बार उसको भी पता नही होती क्योंकि
पर्यावरण संरक्षण उसका सहज व्यवहार है।
एक गृहिणी कै से करती है पर्यावरण संरक्षण, ज़रा ध्यान दें-

  • सामान के साथ आई प्लास्टिक की थैलियो को कूड़े में न फें ककर उन्हें जमा करना और पुन: उपयोग में लाना।
  • प्लास्टिक के चम्मच, कटोरी और प्लेट का उपयोग नही करना।
  • लोहा, गत्ते के टुकड़े, काँच की बोतलें, प्लास्टिक व टिन के डिब्बे को कचरे में न फें क कर उनको एकत्र करना और रद्दीवाले को बेच देना। ऐसा करके
  • वह पर्यावरण को भी सुरक्षित करती है और कु छ पैसे भी उसके हाथ आते हैं।
  • अपने मोबाइल के लिए प्लास्टिक का कवर न खरीद कर उसे मोती-सिपियो की बनी गुथली में सजाती है।
  • बालो को सवारने के लिए भी प्लास्टिक की जगह लकड़ी की कन्घी का उपयोग करती है। माथे को बैलवेट की बिन्दियो से नही कु मकु म से सजाती है।
  • होठो पर लिपस्टिक की जगह दन्दासा ( अखरोट की छाल का दातुन) का उपयोग।
  • आरओ से निकले पानी को कपड़े धोने के लिए उपयोग में लाना।
  • घर में तुलसी सहित अन्य पौधो की देख-सभाल। घर के गमलो में धनिया, पुदिना, मिर्ची व टमाटर उगाकर।
  • बच्चों की पुरानी किताबें जरूरतमंद परिवारो को सौप देना।
  • सब्जी लेने के लिए बाज़ार में कपड़े का थैला लेकर जाना।

पर्यावरण की अकुलाहट

विजया रायकवार

जल, जंगल, जमीन,
वायु और ध्वनि
किस-किस ने इनकी
अकु लाहट सुनी।
जल जीवन में जरूरी
काश इसे स्वच्छ रख पाते प्राण दायिनी नदियो में
अध जले शव नही बहाते।
पेड़ों से ही पलता जीवन
खानपान और जड़ी बूटियां पंछी को छाया मिले सदा
पशु भी आश्रय पाते।
जमीन से जुड़े जन भी
अब अन्न नही उपजाते,
कांक्रीट के जंगल बोकर,
नोटो की फसल उगाते। प्राणवायु अब खत्म हो रही
जिम्मेदार अब कौन,
वायुमंडल दूषित हुआ
जनमानस है मौन।
आओ हम सब पेड़ लगा लें पृथ्वी को फिर से सजा लें पर्यावरण की अवधारणा के
घटको को,
पुनर्स्थापित कर लें।
जल, जंगल, जमीन
और ध्वनि की अकु लाहट समझें
लें शपथ, करें प्रतिज्ञा पर्यावरण का संरक्षण कर लें संवर्धन कर ले…

कै च द रेन :
आओ, मिलकर करें तालाबों की चिंता

जल अनमोल प्राकृतिक संपदा है। यह प्रकृति से किसी वरदान के रूप में संपूर्ण जगत को प्राप्त है। हमारी पृथ्वी पर 71 प्रतिशत जल है, परंतु इस समूची मात्र का 2.6 प्रतिशत पानी ही पीने योग्य (मीठा जल) है। इसमें 1.8 प्रतिशत भाग बर्फ के रूप में उपस्थित है एवं मानव को उपभोग हेतु सिर्फ 0.8 प्रतिशत भाग जल ही मिल पाता है। इसलिए जल का संभलकर उपयोग करना चाहिए। बारिश का मौसम जल संरक्षण का बड़ा अवसर लेकर आता है। इस बारिश में हमें पानी की एक-एक बूंद को भविष्य के लिए सहेजना है। तालाब इसमें हमारे सबसे बड़े सहयोगी हो सकते हैं।

वर्ष जल के संचयन के लिए हमें न के वल नये तालाबो का निर्माण करना चाहिए अपितु पहले से बने तालाबो को तैयार करना चा हिए। पहले से बने तालाबो का सीमा कन, उनका गहरीकरण एवं जीर्णोद्धार समय की आवश्यकता है। ये तालाब न के वल वर्षा जल का संचयन करते हैं बल्कि भूजल स्तर को भी बढ़ाते हैं। बारिश से पूर्व तालाबो का गहरीकरण, साफ़-सफाई और जीर्णोद्धार करना हमारी संस्कृति का हिस्सा भी रहा है। जल संरक्षण में तालाबो की भूमिका के महत्व को ध्यान में रखकर ही इसे पूर्वजो ने सस्कृति का हिस्सा बनाया था।

शहरो एव गाँवो में पहले से बने तालाबो को फिर से जीवंत करना होगा। तालाब निर्माण और रखरखाव में जनभागीदारी समितियो की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पंचायतो में सक्रियता, शासन का सहयोग औेर जनभागीदारी से मृतप्रायः तालाबो का कायाकल्प किया जा सकता है। सामाजिक संस्थाओ को भी जल सरक्षण के अभियान से जोड़ कर तालाबो के गहरीकरण एव जीर्णोद्धार के लिए प्रेरित किया जा सकता है। समाज की सामूहिक गीदारी से ही हम जल संरक्षण एवं तालाब के प्रति स्थायी जागरूकता एवं दायित्वबोध को पैदा कर सकते हैं। ‘बारिश की बूंदो’ को सहेजने के लिए हमें दृढ़ संकल्प लेना होगा।

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